मज़हबी दीवारों के साए में अब पतंगे नहीं उड़तीं
कभी मेरी गली की छतों पर शहर बसा करता था।
मानवता के बिना बताते जिन्दगी नहीं जुडती
मालूम है तब कटती पतंग देख खूब हंसा करता था ।
कभी मेरी गली की छतों पर शहर बसा करता था।
मानवता के बिना बताते जिन्दगी नहीं जुडती
मालूम है तब कटती पतंग देख खूब हंसा करता था ।
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