बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

निबंध

 निबंध

मास्टरजी  नै छात्रों से कहा कि कल गाय पर निबंध लिखकर ही आना।
 दूसरे दिन मास्टरजी ने पूछा कौन निबंध लिखकर नहीं आया है?
 रमलू  तुम बताओ निबंध लिखा?
रमलू  (छात्र): नहीं लिख पाया मास्टरजी.
मास्टरजी (गुस्से मैं ) : क्यों? और ये हाथ में प्लास्टर कैसे चढ़ गया?

रमलू : वह गाय नहीं सांड लिकड़्या  और उसनै  मेरै जोर की लात मार दी।

तीन फेरे रमलू के


पड़ौसियों  की छोरी के ब्याह में फेरे करवावण खातिर कोई बाहमण ना मिल्या । 
जब कित्तै तैं बाहमण का जुगाड़ ना हुया तै छोरी आळे रमलू नै  ले आये । रमलू  नै फेरे शुरु करवा दिये ।
तीन फेरे होण पाच्छै रमलू  बोल्या - भाइयो, रस्म तै पूरी हो-गी, छोरी की विदा करवाओ ।
छोरे आळे बाराती बोले - जी, फेरे तै सात होया करैं ।
रमलू  बोल्या - भाई, बात इसी सै, जै (अगर) उसनै रुकणा होगा तै तीन फेरयां में भी कित्तै ना जावै ।
 अर जै इसनै भाजणा ए सै, तै चाहे पच्चीस फेरे करवा ल्यो !!

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

हरा साग



एक ताई कै तीन-चार बाळक थे । ताई रोज उन ताहीं हरा साग बणा कै दे देती - कदे सिरसम का, कदे चणे का, कदे बथुए का ।
बाळक बोले - मां, रोज-रोज हरा साग मत बणाया कर, कदे दूसरा भी बणा लिया कर ।
ताई बोल्ली - खाओ चाहे मत खाओ, मैं तै रोज हरा साग ए बणाऊंगी ।
बाळक फेर बोले - इसतैं आच्छ्या तै हामनै गळामा घाल-कै खेत में चरा ल्याया कर !

बटेऊ की हाजर जवाब सास



एक बै एक बटेऊ ससुराल गया । पहले ससुराल में साग-सब्जी, बूरा आदि मैं  तब  तक घी की धार डालते रहते थे जब तक कि मेहमान हाथ आगे कर के "बस, बस" कर के रोकता नहीं था । जब सास बूरा में घी डाल रही थी, तो बटेऊ परे-नै मुंह करकै बैठग्या - कदे "बस-बस" ना करना पड़ जावै ।
पर सासू भी कम चालाक नहीं थी । वो उसका मुंह वापस घी-बूरा की तरफ घुमा कर उसको दिखाती हुई बोली - "रै देख, बटेऊ जितणा तै दिया सै घाल, अर पहलवानी करणी सै तै आपणै घरां जा करिये" !!

गादड के कान

गादड के कान

एक बै…..एक गादडी के पाछे दो कुत्ते लागरे थे। वा भाज कै एक दूसरे गादड के बिल में बड़गी । गादड बडा मसखरा था। वो आपणी बहू तै बोल्या…..बूझिये  बहू नै…..क्यूं तंग पारी सै..?
गादडी बोल्ली…….म्हारै छोरी के बटेऊ आरे सैं……अर आजै ले जाण की जिद कररे सैं।
गादड छो मैं  भर कै बोल्या…..मैं देखूं सूं उननै  जाकै। अकड मैं  गादड नै  बिल तै मुंह  बाहर काढ्या  तै दोनूं कुत्यां  नै उसके दोनूं कान पकड लिये। गादड झटका मार कै उलटा ए बिल में बडग्या। पर कान कुत्यां  के मुंह मैं  ए  रहगे । भीतर दूसरी गादडी नै  गादड की बहू तै कहा, पूछिये री…….मेरे पितसरे के कानां कै के होग्या….?
गादड बोल्या………बटेऊ तै घणें ऊंत सैं। वैं छोरी के धोखें में मन्नै ए ट्राली में गेर के ले जावैं थे। बडी मुश्किल तै पिंडा छुड़ा कै आया सूं…!!

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

छक्का1

छक्का
गरीब की बात हमेशा  बस चुनाव में  होती है
 चुनाव गए गरीब गया गरीबी फिर रोती है
हरयाणा की राजनीति गोत व जात को ढोती है
इलाकावाद की भरम फिर सबको  डबोती है
मैरिट मानवता फिर वजूद अपणा खोती  है
ये जातिगत राजनीति बीज घृणा के बोती है
"रणबीर "

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

छक्का


छक्का
गऊ शाळा और  मंदिर बणा जो  खुद की गोज भरण लगे
बण धर्म गुरु माँ बाहणां की जो ईज्जत पै नीत धरण लगे
इसे  चालबाज नेता बण कै जनता का शोषण करण लगे
बचियो इसे धर्मात्मावां तैँ जो चौड़े  द्रोपदी चीर हरण लगे
लोग इनकी भकायी मैं आकै झूठे सप्नयां मैँ तिरण लगे
झूठे वायदे पिलाकै दारू धरण विधान सभा मैं चरण लगे
"रणबीर "
सच का सौदा झूठ बेचते कट कट कर मरते देखो
जात गौत की जफी पारे रंग सेक्युलर भरते देखो
भूले हारीबीमारी याराना दवा कंपनी से करते देखो
पुलिस अफसर सब ईनसे खामखा आज़ डरते देखो
जहाँ जनता गयी वहीँ पे ये अत्याचारी घिरते देखो
काँग्रेस कभी भाजपा  इनेलो के पाले फिरते देखो