आंधी चल रही ये नहीं थमीं यारो
रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो
कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे
कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे
हम सब बेचें हैं इसके थपेड़े खाकर
तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर
यह आंधी आज किसे साल रही देखो
झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो
रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो
कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे
कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे
हम सब बेचें हैं इसके थपेड़े खाकर
तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर
यह आंधी आज किसे साल रही देखो
झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें