शनिवार, 21 अप्रैल 2012

लन्दन की यात्रा तैं लौट कै आये रमलू नै अपनी घराली तैं बूझ्या – “के मैं विदेशी बरगा दीखूं हूँ ?”

घराली – “जमा बी ना …”

संता – “तै फेर लन्दन मैं एक औरत क्यों बुझै थी अक मैं विदेशी सूँ अक ------

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