सोमवार, 18 जून 2012

बूझे आळा पंडित

बूझे आळा पंडित

गाम कै बाहर भीड़ लाग रही थी, रमलू आया खेत म्हां तैं, लाम्बा लठ ले रहया अर बोल्या - अरै के हो रहया सै ?

एक जणा बोल्या - ताऊ, यो बाहमण आगे की बतावै सै । रमलू  फेर बोल्या - हाटियो भाई मन्नै भी देखण दयो  के रोळा सै ।

रमलू बाहमण तैं बोल्या - हां भाई, तू आगे की बतावै सै ?

बाहमण - हां जी ।

रमलू  नै लठ ऊपर नै ठाया अर बोल्या - "आंच्छ्या तै, बाहमण, तू न्यूं बता यो लठ तेरे सिर में लागैगा अक गोड्यां पै ?"

बाहमण नै सोच्या, जै सिर में कहया तै यो तेरे गोड्यां नै तोड़ैगा अर अगर गोड्यां पै कहया तै यो सिर नै फोड़ैगा !

बाहमण हाथ जोड़-कै खड़या हो-ग्या अर बोल्या - "चौधरी साहब, मैं कुछ ना जानता आगे-पाच्छे की, मन्नै माफ कर दे ।"

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