इसीलिए हम देखते हैं कि आजादी के आन्दोलन के दौरान तरह तरह की शैक्षिक ,साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाएं खड़ी हो गयी ,जिनके जरिये भारतीय भाषाओँ तथा उनके साहित्य को विकसित करने , लोगों को शिक्षित करने का काम हुआ | फिर उस काम को देश की आजादी के लक्ष्य से जोड़ा गया , सब भाषाओँ और विभिन्न संस्कृतियों को जोड़कर एक राष्ट्रीय संस्कृति की परिकल्पना की गयी और विविधता में एकता की बात की गयी |सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर ध्यान देने वाले कितने ही आन्दोलन चले और कितने ही संगठन बने | उदहारण के लिए , भारतीय कम्यूनिष्ट आन्दोलन के साथ साथ प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा ('इंडियन पीपुल्स थियेटर असोसिएसन ' यानि भारतीय नाट्य संघ) जैसी संस्थाएं बनी | इस सबके पीछे यही चेतना काम कर रही थी की मानसिक स्वराज के बिना राजनितिक स्वराज नहीं मिलेगा और मानसिक स्वराज का अर्थ था एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक नवजागरण | जारी है --